लोग कहलन कि हमरे चाल में खराबी हौ,
सच इ बा कि तोहरे गाँव के हवा शराबी हौ।
गुलाबो दुबक जाला कवनो कोना-अंतरा में,
तोहरे गाल के रंगत त अइसन गुलाबी हौ।
तोहरे हँसी से खिल जाला हमार जिनगी,
जइसे बंजर धरती पर बरखा नवाबी हौ।
तोहरा--हमरा पर जे लोग उठावेला उंगली,
सच कहा त ओनहीं में असली खराबी हौ।
तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन,
कबहूँ-कबहूँ लागेला थोड़ा हिसाबी हौ।
तोहरे हँसी से खिल उठेला जिनगी के मौसम,
छँट गइल अन्हेरा काहे कि रात महताबी हौ।
हम खामोश बानी त आउर कुछ ना समझs,
हमार चुप्पी तोहरे नाम चिट्ठी जवाबी हौ।
तोहरे संगे बितावल हर इक लम्हा लागे,
जइसे किस्सा पुरान, मगर
लाजवाबी हौ।
‘वर्मा’ दिल के बात कागज पर उतार देला,
सच कहीं त एहमें ओकरे कामयाबी हौ।

wah!
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंबहुत खूब वर्मा जी.
हटाएंआभार आपका 😃
हटाएंशुक्रिया
जवाब देंहटाएंबहुतै सरस !
जवाब देंहटाएं😃
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंसुंदर सृजन !
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएं👌🌹
जवाब देंहटाएं❤️
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंशुक्रिया 😃
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार 😃
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