युद्ध की विभीषिका भी
बुझा नहीं पाती
प्रेम की लौ को,
क्योंकि वह मोहताज नहीं
किसी बाह्य ऊर्जा की।
सदियों से कोशिश की गई
हार्मूज़ अवरुद्ध कर
इसकी आपूर्ति रोकने की।
कभी खाप के माध्यम से,
तो कभी ऑनर किलिंग करके,
उस पर बम बरसाए गए।
फिर भी
हर मलबे के नीचे से
किसी जिद्दी अंकुर की तरह
फूट पड़ता है प्रेम।
आज जिस तरह दुनिया
युद्धजनित ऊर्जा-संकट से
हाहाकार कर रही है,
प्रेम के लिए तो
ये परिस्थितियाँ
चिर-परिचित हैं;
वह तो अक्सर
अभाव, प्रतिबंध
और प्रतिरोध की अँधेरी सुरंगों में ही
सबसे अधिक परिपुष्ट होता है।
क्योंकि
नफ़रत की हर सत्ता
सीमाओं में क़ैद होती है,
पर प्रेम
हर बार
सीमाएँ लाँघकर
जी उठता है।

सुंदर सृजन, प्रेम की बेल अमर जो है
जवाब देंहटाएंशुक्रिया 😃
हटाएंसृष्टि का आधार ही है प्रेम
जवाब देंहटाएंआशाओं का आकार है प्रेम
स्वयं के लिए बेशकीमती ज़ज़्बात;
दूसरों के लिए संकीर्ण विचार है प्रेम।
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सादर
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २६ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
वाह
हटाएंआपकी पंक्तियाँ अद्भुत
धन्यवाद 😃