उसने कहा—
“मैं पीड़ा में
हूँ।”
सत्ता मुस्कुराई,
और उसकी आवाज़ को
रिकॉर्ड से बाहर
कर दिया गया।
सबूत के नाम पर
उसी के चेहरे की
एक AI-निर्मित
हँसती हुई तस्वीर
पेश की गई—
और फ़ैसले में
लिखा गया—
“पीड़ा का कोई
प्रमाण नहीं मिला।”
क्योंकि
दर्ज रिकॉर्ड में
वह हर फ़्रेम में
मुस्कुराता पाया
गया।
इतना ही नहीं—
उस पर यह भी
इल्ज़ाम लगा
कि उसने
अपनी ही पीड़ा का
झूठ गढ़कर
सत्ता को बदनाम
करने की
साज़िश रची।
और अंत में—
“जनता को गुमराह
करने” की धारा में
उस पर जुर्माना
ठोंक दिया गया।
फिर—
उसकी उसी
मुस्कुराती तस्वीर को
हर चौराहे पर
होर्डिंग बनाकर
टाँग दी गई,
और नीचे लिखा था—
“यह है
राज्य की खुशहाली
का प्रमाण।”

सटीक व्यंग्य
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंगहरा कटाक्ष !
जवाब देंहटाएंनक़ली मुस्कानों को होर्डिंग्स पर सजाने से ही समाज सुखी हो जाता, तो सरकारों के लिए शासन चलाना कितना सरल हो जाता!
Thanks 😊
हटाएंज़बरदस्त व्यंग प्रस्तुत किया है
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंWah!
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंआपने जिस तरह सत्ता और सच के बीच की दूरी दिखाई, वह बहुत कड़वी लेकिन सच्ची लगती है। मुझे सबसे ज्यादा यह बात लगी कि एक नकली मुस्कान असली दर्द को कैसे दबा देती है। आजकल टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल भी ऐसे ही सच को मोड़ देता है, और लोग उसी को सच मान लेते हैं।
जवाब देंहटाएंगहन विश्लेषण के लिए शुक्रिया
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