शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

ट्रिगर पर उंगली

 

इसी चौराहे पर
एक कत्ल हुआ,
सरेआमगोली मारी गई।

हैरत ये नहीं
कि खून बहा सड़कों पर,
हैरत तो ये है
जो मरा है
वह पहली बार नहीं मरा।

वह पहले भी मारा गया था,
कल किसी और चौराहे पर,
और यकीन मानो
कल फिर मारा जाएगा
किसी नए नाम से,
किसी नई भीड़ के सामने।

और जो खड़ा है
ट्रिगर पर उंगली रखे
वह भी कातिल नहीं है,
क्योंकि यहाँ
हर रोज चेहरा बदलता है,
पर उंगली नहीं बदलती।

वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं
पूरी व्यवस्था की है,

जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।

10 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

मेरा फेसबुक मेटावर्स के कारण लगभग बंद है
सोच रहा हूँ किया जाए..
ई-मेल दीजिएगा, या संपर्क फार्म मे कुछ लिख दीजिएगा
गाहे-बगाहे सूचना हेतु सहायता मिलती है
वंदन

Anita ने कहा…

शायद इसी व्यवस्था का नाम संसार है

M VERMA ने कहा…

या शायद हम इसी व्यवस्था को स्वीकारते जा रहे हैं

Razia Kazmi ने कहा…

इस व्यवस्था को फ़ैशन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है

M VERMA ने कहा…

😔

M VERMA ने कहा…

जी जरूर

Admin ने कहा…

आपने चौराहे और हत्या के जरिए व्यवस्था की सच्चाई को बहुत साफ दिखाया है। मुझे सबसे ज्यादा “उंगली नहीं बदलती” वाली बात लगी, क्योंकि वह सीधा सिस्टम पर चोट करती है। सच सच कहु तो आपने शब्द कम रखे लेकिन असर गहरा रखा।

M VERMA ने कहा…

रचना सार्थक हुई

Aman Peace ने कहा…

Wah!!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊