सोमवार, 9 मार्च 2026

सूरज को अल्टिमेटम

 

सूरज,
तुम्हारी निष्पक्षता पर
अब संदेह होने लगा है।

लगता है
रोशनी का वितरण भी
अब किसी फाइल में अटका हुआ है।

झोपड़ियों तक पहुँचने से पहले
तुम्हारी किरणें
अक्सर अट्टालिकाओं की बालकनी में
आराम करने लगती हैं।

अगर यह सच नहीं है
तो अपनी रश्मियों को आदेश दो
वे उतरें
उन तंग गलियों में भी
जहाँ अँधेरा
सिर्फ रात नहीं,
पीढ़ियों की विरासत है।

जरा वहाँ भी ठहरोसूरज,
जहाँ सुबह आने में
अब तक सदियाँ लग जाती हैं।

और अगर यह काम
तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता,
तो साफ़-साफ़ बता दो।

क्योंकि फिर
हम इंतज़ार नहीं करेंगे।

हम अपने हाथों से
दीपक जलाएँगे,
जुगनुओं को साथ मिलाएँगे,
और उन गलियों में रोशनी ले जाएँगे
जहाँ अँधेरा
सिंहासन पर बैठा है।

यह एक अंतिम सूचना है
अगर अपनी सत्ता का
बिखराव नहीं देखना चाहते
तो समझ लो

अब लोग आसमान की ओर
कम देखते हैं,
अपने हाथों की ओर
ज़्यादा।

क्योंकि जब इंसान जाग जाता है,
तो उसे सुबह के लिए
सूरज की ज़रूरत नहीं पड़ती।

6 टिप्‍पणियां:

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Sweta sinha ने कहा…

सकारात्मक ऊर्जा, ओजपूर्ण संदेश देती अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति सर।
चलो भरें धूप की कतरनें मर्तबानों में
कर दे दफ़्न कहीं तम की जुब़ानों को
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत सुंदर रचना

Anita ने कहा…

तंग गलियाँ तो आदमी ने ही बनायी हैं, सूरज का भला इनसे क्या लेना, वह तो युगों-युगों से जल रहा है ताप और प्रकाश देने के लिए