बुधवार, 4 मार्च 2026

गर्भ पर पहरा

 

तैनात हैं...

चारों ओर!

धर्म के, जाति के

और तथाकथित 'संस्कारों' के

वे स्वयंभू सैनिक, जो डर से पैदा हुए हैं।

वे घेरा डाले खड़े हैं... 

उस नन्ही सी कोख पर,

उन्हें 'गर्भ' पर कब्ज़ा करना है।

 

उन्हें डर है

कहीं यह नवजात

उन्मुक्त हवाओं की सोहबत में न आ जाए,

कहीं जन्म लेते ही वह

सूरज की सीधी रोशनी को 'सत्य' न मान ले।

 

इसलिए

इससे पहले कि वह 'मनुष्य' बने,

वे उसकी देह पर पहचान का 'टैग' टाँक देना चाहते हैं।

वे चाहते हैं... 

उसकी पहली मासूम किलकारी में

अपनी नफरतों का 'घोषणापत्र' भर देना!

 

वे आतंकित हैं

कहीं वह सवाल न सीख जाए,

कहीं उसकी जुबान 'क्यों' का उच्चारण न कर दे,

कहीं वह

विरासत में मिली इन 'दीवारों' को,

बाहर जाने का 'दरवाज़ा' न समझ ले!

 

उनकी साजिश गहरी है

वे चाहते हैं, पहली साँस के साथ

उसके फेफड़ों में 'खौफ' की हवा भर दी जाए,

और पहली धड़कन की दस्तक पर ही

सड़ी-गली मर्यादाओं का भारी 'ताला' जड़ दिया जाए।

 

क्योंकि...

वे जानते हैं

जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,

उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...

और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—

महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!

14 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 05 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Bharti Das ने कहा…

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Harash Mahajan ने कहा…

अति सुंदर !!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Razia Kazmi ने कहा…

वाह क्या बात है अंत तो एकदम से बदल दिया है

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

नूपुरं noopuram ने कहा…

आस्था और विश्वास पर दुर्भावना का हावी होना बहुत व्यथित कर देता है, जिसका आपने गहन विश्लेषण किया है । पत्थर के भगवान यह देख कर मुस्काते हैं कि अपना सारा किया-धरा मनुष्य भगवान पर मढ़ कर संतुष्ट हो जाते हैं । खैर प्रस्तर पर प्रहार से ही प्रतिमा गढ़ी जाती है । शेष.. जाकी रही भावना जैसी । आपने सोचा तो सही ..

M VERMA ने कहा…

पत्थर प्रतिमाओं ने पत्थर उठाने को उकसाने का काम किया है
गर्भ में पल रहे अछूते शिशु के जाति धर्म के निर्धारक यह समाज क्यों?
शुक्रिया