रविवार, 25 जनवरी 2026

हस्ताक्षर में साज़िश

 

चलो जाँच-जाँच खेलते हैं
सच को छिपाने के लिए यह ज़रूरी है।

जाँच रिपोर्ट में
पोस्टमार्टम, फ़ॉरेंसिक
जैसे शब्द शामिल करना मत भूलना
शब्दों से लाश ढँक दी जाती है
ताकि बदबू बयान न दे।

सबसे बड़ी बात,
बलात्कार शब्द को फटकने भी मत देना,
वरना लोग
मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर आ जाएँगे।

कारण-ए-मौत को
परिस्थितिजन्य लिख देना,
और परिस्थितियाँ
हम तय करेंगे।

खून अगर सड़क पर फैला हो
तो लिखना
नमूने सुरक्षित नहीं थे।

आँसू अगर गवाह हों
तो लिखना
भावनात्मक साक्ष्य अमान्य है।

और सुनो
घटनास्थल पर गाड़ियों का हुजूम दौड़ाते रहना,
मीडिया से कहनाजाँच जारी है।

कैमरों की फ़्लैश चमके
तो नज़रें झुकाए रखना,
ताकि लगे कि तुम काम कर रहे हो।

जाँच पूरी हो जाए
तो फ़ाइल पर धूल जमने देना
धूल भी एक तरह का
राष्ट्रीय सुरक्षा कवच है।

अंत में निष्कर्ष जोड़ देना
कोई साज़िश नहीं पाई गई”,
क्योंकि साज़िश
हमेशा रिपोर्ट लिखने वालों के
हस्ताक्षर में होती है।

4 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

सटीक

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद

Sweta sinha ने कहा…

एकदम सही, आक्रोशित अभिव्यक्ति।
व्यवस्थाएं जिनकी सहूलियत के लिए हैं वही बेबसी के आंसू रोये तो ऐसी व्यवस्थाएं किस काम की।
सिर्फ बातें करने से कुछ नहीं होता।
-------
सादर।
--------
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २७ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

जी आभार