सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

4 टिप्‍पणियां:

  1. व्वाहहहहहह
    शानदार
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह , सकारात्मक ओजपूर्ण नवगीत।
    हर बंध बहुत अच्छा है सर।
    सादर।
    ---------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २० जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं