तुम आसपास कहीं नहीं,
फिर भी हवा हो क्या
ख़यालों की सरगोशी की तुम सदा हो क्या
शाख़-ए-वजूद
हिल उठे, एहसास जी उठें
कुछ अधमरे जज़्बातों की तुम दवा हो क्या
लबों
से कुछ कहो न कहो, आँखें
कह गईं
बिन छुए दिल को मिल जाए जो, वो दुआ हो क्या
नींदों
के दरमियाँ तुम सपनों में आ गईं
बिखरी हुई सी ज़ुल्फ़ों की तुम अदा हो
क्या
जिस
दर्द से गुज़र गईं, वो
दर्द ही न रहा
पत्थर को भी पिघला दे, ऐसी रवा हो क्या
नब्ज़
देखी नहीं तुमने, हाल
कह दिया
मेरे हर टूटे लफ़्ज़ की तुम पुनर्नवा हो
क्या
“वर्मा” जो ठंड में भी सुलगता रहा चुपचाप
उस सुलगन को संभाले जो, वो तवा हो क्या

वाह बहुत सुंदर ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंWah!
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंलाज़वाब गज़ल सर।
जवाब देंहटाएंहर इक शेर बहुत सुंदर बन पड़ा है।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना सोमवार १३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
देर से आमंत्रित करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूॅं।
धन्यवाद
जवाब देंहटाएंबहुत ही शानदार
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंवाह ! आदरणीय , स्वाद आ गया ! अभिनंदन ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंवाह! बहुत सुन्दर और हर इक शेर बेहिसाब।
जवाब देंहटाएं'तुम आसपास कहीं नहीं, फिर भी हवा हो क्या
ख़यालों की सरगोशी की तुम सदा हो क्या'
धन्यवाद
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