रविवार, 15 अप्रैल 2012

आज वह मर गया …



आज वह मर गया;
ऐसा नहीं कि
पहली बार मरा है
अपने जन्म से
मृत्यु तक
होता रहा तार-तार;
और मरता रहा
हर दिन कई-कई बार,
उसके लिए
रचे जाते रहे चक्रव्यूह,
और फिर
यह जानते हुए भी कि
वह दक्ष नहीं है
- चक्रव्यूह भेदनकला में,
उसे ही कर्तव्यबोध कराया गया;
और उतारा गया
बारम्बार समर में,
हर बार उसके मृत्यु पर
विधिवत निर्वहन हुआ
शोक की परम्परा का भी,
और फिर आंसुओं का सैलाब देख
वह पुन: पुनश्च,
उठ खड़ा होता रहा.
.

पर आज जबकि
वह फाइनली मर गया है,
रचा गया है
फिर एक नया चक्रव्यूह
उस जैसे किसी और के लिए.

27 टिप्‍पणियां:

  1. गहन भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई बहुत अच्छी प्रस्तुति.

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  2. जीवन के कुरूक्षेत्र में परिवार के किसी न किसी सदस्य को तो बार-बार मरने का बीड़ा उठाना ही पड़ता है। कविता हमे आईना दिखाती है कि पहचान लो अपना चेहरा और तय कर लो अपनी भूमिका ! आखिर कौन हो तुम ?

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  3. न जाने कितने चक्रव्यूह हैं जो ऐसे ही मौत देते हैं ... गहन अभिव्यक्ति

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  4. यहाँ हर पग पर जयद्रथ खड़े हैं, अभिमन्यु पर घात लगाने के लिये।

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  5. ये अभिमन्यु का प्रारब्ध
    चक्रव्यूह मे फंसा स्तब्ध
    लौट लौट फिर आना है
    उसको लड़ते जाना है....

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  6. इंसान का ईमान भी ऐसे ही बार बार मरता है .

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  7. हर रोज नए चक्रव्यूह रचे जाते हाँ और नए अभिमन्यु की तलाश होती है ... कुरुक्षेत्र कभी खत्म नहीं होता ...

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  8. जीवनरूपी चक्रव्यूह मे आज हर अभिमन्यु का यही हाल है……………बेहतरीन प्रस्तुति।

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  9. यह भी जीवन का एक रूप है, गहन भावव्यक्ति...

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  10. समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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  11. गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  12. अगला भी वैसा ही शिकार होता रहेगा...

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  13. कितनी सहजता से बयाँ करी आपने चक्र्व्यूह की निरंतरता! वाह!

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  14. बहुत गहन भाव............
    जीवन रुपी युद्ध में पल-पल शिकस्त होती है मानव की...तिलतिल मरता है..............

    बहुत खूब सर.

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  15. गहन भाव लिए बेहतरीन प्रस्तुति।

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  16. इस महासमर के महारथी छल के वार करने में आगा-पीछा कहाँ देखते हैं !

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  17. अभिमन्यु की नियति यही है इस क्रूर विश्व के लिए ....
    शुभकामनायें भाई जी !

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  18. हर दौर के अभिमन्यु ऐसे ही छले जते रहे हैं।

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