मंगलवार, 29 जून 2010

निश्चल; निर्विकार मैं बिजूका ......



मुझे तैनात किया गया

फसलों को नष्ट करने वाले

अनाहूत पशुओं से रक्षा के लिये;

मुझे तैनात किया गया

खेतों के ऊपजाऊपन को चुराने वालों को

डराने के लिये,

और मैं अविचल खड़ा हो गया

बाहें पसारे; तत्पर (!)

वे मेरे देखते देखते

ऊपजाऊ मिट्टी पर

कब्जा कर लिये

मैं उन्हें रोकना चाहकर भी

रोक नहीं पाया

मेरे देखते देखते

जंगली पशुओं के झुंड ने

धावा बोल दिया

और तहस-नहस कर दिया

मेरे समक्ष उगी फसलों को

शायद मेरे प्रतिकार की

समस्त ताकत जवाब दे गयी थी;

या शायद मेरी अकर्मण्यता

मुझे हिलने नहीं दे रही थी;

या शायद मेरे भय ने

मुझे जड़ बना दिया था,

आज भी मैं खड़ा हूँ निर्विकार

अपने स्थान पर

अपने उत्तरदायित्वबोध से गर्वित

हिल न सकने की हद तक

अपने वजूद से जुड़ा

निश्चल;

निर्विकार

मैं बिजूका ......

57 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रतीक का चयन ... आज के हालात का सटीक चित्रण
    सुन्दर कविता

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  2. अपने उत्तरदायित्वबोध से गर्वित ,बहुत सुन्दर

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  3. अच्छी लगी कविता
    बहुत सुन्दर

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  4. बजुका की जगह भारतीय नेता लिख देते तो भी एकदम सही होता ! बहुत ही बढ़िया व्यंग्य !

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  5. एक नया पन और नई अंदाज में लिखी गई कविता दिल जीत लेती है...वर्मा जी बेहतरीन अभिव्यक्ति...बधाई स्वीकारें

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  6. har chaurahe par khade ye nischal nirviaar bajuke ...
    sirf chunav se pahle kuch samay tak inme aa jati hai jaan ...

    marmsparshi rachna !

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  7. उत्तरदायित्व और स्थानमुग्धता, दोनों के अन्तर्द्वन्द को उभार दिया है ।

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  8. घुमाकर बहुत गहरी बात कह गए वर्मा जी ।
    अति सुन्दर ।

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  9. प्रतीक भी सही चुना और व्यंग भी करारा है ।

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  10. Shayad ham sabhi apne jeevan me kabhi na kabhi,anchahe sahi,bajuka ban jate hain! Aapne ekdam se aanken khol deen...!

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  11. यह रचना हर उस व्यक्ति को इंगित करती है जो बिजूका बन किसी भी घटना से विचलित नहीं होता...सुन्दर प्रतीकात्मक रचना...

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  12. मैं अविचल खड़ा हो गया बाहें पसारे; तत्पर

    बहुत सुन्दर

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  13. आज भी मैं खड़ा हूँ निर्विकार

    अपने स्थान पर

    अपने उत्तरदायित्वबोध से गर्वित

    हिल न सकने की हद तक

    अपने वजूद से जुड़ा

    निश्चल;

    निर्विकार

    मैं बजूका ......
    बहुत खूब । अच्छी रचना के लिये बधाई।

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  14. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  15. बहुत बढ़िया!



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  16. वाह्……………गज़ब की प्रस्तुति।

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  17. आप ने बहुत सही लिखा अपनी कविता मै आज के भारत के हालात.....

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  18. हर बिजूका को इंगित करती रचना ..बहुत उम्दा.

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  19. बहुत बढ़िया बहुत पसंद आई यह ..

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  20. सरोकारों के साथ खड़ी पंक्तियां...

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  21. बहुत ही उम्दा सोच.. कविता के माध्यम से ध्यान आकर्षित किया इस मुद्दे की तरफ भी..

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  22. यह कविता काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है । बिम्ब पारम्परिक नहीं है – सर्वथा नवीन। इस कविता की अलग मुद्रा है, ये करूणा के स्वर नहीं है । यह प्रस्तुत करने का अलग और नया अंदाज है।

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  23. प्रतीक-बिम्ब के माध्यम से सुन्दर बात कहती कविता..साधुवाद.

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  24. प्रतीक चयन लाजवाब है....बड़ा ही सटीक चित्रण किया है आपने...

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  25. बढ़िया प्रतीकात्मक रचना ! बिजुका से सुनना अच्छा लगा ! शुभकामनायें भाई जी

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  26. भावनात्मक वर्णन किया है आपने ... एक हारे हुवे इंसान का ... जो चाहता तो है पर कुछ कर नही पाता ... बिजूका हमारे ही मन में है .... हमारी आत्मा में है ....

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  27. बिजूका अपने आप मे एक सशक्त बिम्ब है \ मैने इसका उपयोग भूकम्प से सम्बन्धित एक कविता मे किया है कभी अवसर आया तो ब्लॉग पर दूंगा । यह अच्छा लगा

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  28. ek bijooka ke madhyam se aadmi ki akarmyadta pe ek bada prahar kiya aapne..behad shandar lagi yah rachna aapki ..

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  29. good poem, it's good to read this poem it trully shows the presents condition whats going on around us it's really a good poem....

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  30. it's such a nice poem. it really shows the current condition of politics whats going on around us it's really a good poem...

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  31. यह कैसी मजबूरी और लाचारी?... शायद हमारी सभी की कहानी कुछ कुछ ऐसी ही है!... अति सुंदर भाव!

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  32. बिजूका जैसे अछूते शब्द को भी नही छोड़ा!
    --
    बहुत सुन्दर!

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  33. आज भी मैं खड़ा हूँ निर्विकार

    अपने स्थान पर

    अपने उत्तरदायित्वबोध से गर्वित

    हिल न सकने की हद तक

    अपने वजूद से जुड़ा

    निश्चल;

    निर्विकार

    मैं बिजूका ...
    बहुत-बहुत सुन्दर.

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  34. Kitna sach hai...jab kabhi khud ko pahchaan jane ki koshish karte hain,swayam ko bauna pate hain! Kis qadar khoobi se aapne rachana rachi hai!

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  35. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  36. शिनाख्त की कवायद की कहानी है यह कविता....लम्बी कविता में तारतम्यता बनाये रखना हमेशा ही कठिन होता है मगर आपने पूरी कविता में विषय के साथ ले बरकरार रखी है.......वाकई शानदार कविता है.

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  37. नए तरह के बिम्ब का प्रयोग करते हैं आप! बिम्ब भी बिलकुल शहर के बीच से उठाते हैं और बहुत कुछ कह जाते हैं ! सुंदर कविता

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  38. शायद मेरे भय ने मुझे जड़ बना दिया था, आज भी मैं खड़ा हूँ निर्विकारअपने स्थान परअपने उत्तरदायित्वबोध से गर्वितहिल न सकने की हद तकअपने वजूद से जुड़ा निश्चल;निर्विकार मैं बिजूका ..
    ........ek antheen sangharsh karta bijuka ke manodasha ka samvedansheel chitran ke liye aabhar

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  39. bahut achha likha aapne..
    aaj ke waqt or halaat ke upar likha hai...
    Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
    aapke comments ke intzaar mein...

    A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

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  40. बहुत सुन्दर!!
    बिजूका उर्फ कागभगोड़ा के माध्यम से आपने राजनैतिक विसंगितयों ओर राजनीतिज्ञों की विडम्बनाओं को बहढत्रया अंदाज में प्रस्तुत किया है। बधाई!
    अपनी रचना के लिए काग भगोड़ा उर्फ बिजूका के लिए नेट में चित्र खोजते हुए आपके ब्लाग में पहुंचा। आपके चित्र ले रहा हूं। घटनोत्तर स्वीकृति प्रदान करें।

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