शनिवार, 19 सितंबर 2009

नामुमकिन है बरी हो पाना ~~

पीठ पीछे भी तुम एक आँख रखो
ज़ेहन में अपने एक सलाख रखो

सबूत माँगेंगे लोग आग लगने का
अपनी मुट्ठियों में तुम राख रखो

सूरज से गुफ़्तगू करने निकले हो
सिर पे तुम दरख़्त की शाख रखो

नामुमकिन है तुम्हारा बरी हो पाना
संग अपने सबूत बेशक लाख रखो

चल रहे तीर दिल को छू न सकें
जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो

हवा का रुख़ समझ कर ही क़दम रखना
बचा के आँधियों से अपना चिराख़ रखो

~~~~~

34 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है-हर शेर दाद के काबिल.

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  2. wah verma ji, jism ke aar paar ek soorakh rakho. bahut khoob sabhi sher umda. badhai.

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  3. varmaaji..........mubaaraq ho.....

    aflaatoon gazal..........

    raakh ka jawaab nahin

    badhaai dil se.......

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  4. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो
    लाजवाब हर शेर काबिले तारीफ है बधाई

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  5. चल रहे तीर दिल को छू न सकें
    जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो
    जिस्म मे सुराख -- वाह क्या कहने
    बहुत खूबसूरत == हर शेर बेहतरीन

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  6. वाह लाजवाब !!


    सुराख करवा ही लेता हूँ अब तो
    दुकान बता दैंगे प्लीज

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  7. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

    बहुत बढ़िया शेर हैं।
    जिन्दाबाद!

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  8. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

    लाजवाब शेर काबिले तारीफ है बधाई

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  9. काफी दिनों बाद आपका लिखा हुआ ख़ूबसूरत रचना पढने को मिला! बहुत बढ़िया और शानदार रचना लिखा है आपने! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

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  10. अच्छी रचना, उम्दा शब्द। बढि़या, उम्दा प्रस्तुति।

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  11. चल रहे तीर दिल को छू न सके जिस्म के आर पार एक सुराख़ रखो ..नामुमकिन है ऐसे शेर पढ़कर भी दाद ना देना..!!

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  12. चल रहे तीर दिल को छू न सकें
    जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो

    एक एक शेर जैसे नगीने सा जड़ा गया हो ग़ज़ल मे..बेहतरीन

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  13. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

    नामुमकिन है तुम्हारा बरी हो पाना
    संग अपने सबूत बेशक लाख रखो

    एक एक शेर कमाल का .... लाजवाब, विद्रोह का स्वर उठाते, आक्रोश से भरे ........... लाजवाब वर्मा जी ....... कमाल की ग़ज़ल है .......... इतने दिनों बाद आपके ब्लॉग से .........

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  14. वाकई यह शेर बहुत खूबसूरत है--
    सबूत मांगेगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

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  15. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

    सूरज से गुफ्तगू करने निकले हो
    सिर पर तुम दरख्त की शाख रखो

    Bahut hee lajvaab sher !!!

    Arthpoorn !!

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  16. नामुमकिन है तुम्हारा बरी हो पाना
    संग अपने सबूत बेशक लाख रखो...bahut achhi rachna hai....tun kahi bhi rahe sar pe tere ilzam to hai....

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  17. ऐसी कैद तो हमको मंजूर है। जनाब..बहुत खूब लिखा है।

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  18. सबूत माँगेंगे लोग आग लगने का
    अपनी मुठ्ठियों में तुम राख रखो

    बहुत ही बढिया, वर्मा साहब

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  19. आदरणीय वर्मा साहब,

    हर एक शे’र उस्तादाना है।

    क्या कहा है :-

    सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    आपकी कृपा रही तो मैं भी सीख लूंगा कुछ कहना।

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  20. सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो


    sabse acchi line !!!
    behterin !!
    behterin !!

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  21. चल रहे तीर दिल को छू न सकें
    जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो

    bahut hi sundar rachana

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  22. वर्मा जी, बहुत अच्छी लगी आपकी रचना विशेष रूप से यह शेर

    सबूत मांगेंगे लोग आग लगने का
    अपने मुट्ठियों में तुम राख रखो

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  23. सीधे दिल में उतरने वाली रचना

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  24. चल रहे तीर दिल को छू न सकें
    जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो

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    सुन्दर! सम्भव है, मित्र?

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  25. सभी शेर एक से बढ़कर एक किसी एक की तारीफ करना दूसरे के साथ नाइंसाफी होगी, बधाई

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  26. wah! ek ek shabd bol raha hai..............

    zinda shabdon ka jadoo kiya hai aapne..... is mein .....

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  27. "Ba-izzat baree honewalon
    Jao zindgee ka
    jashn manao..."

    Nahee hote baree ham,to apne zameer se...kitna sach kaha...

    http://shamasansmaran.blogspot.com

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