गुरुवार, 16 जुलाई 2026

प्रेम का फिक्स डिपॉजिट

 

मेरे दिल में
जितना भी प्रेम था,
सब मैंने फिक्स डिपॉजिट में
तुम्हारे पास रख दिया।

अब मैं उसके ब्याज से ही
अपना काम चला रहा हूँ,
कभी यादों की आमदनी से,
कभी जुदाई की देयता से
हिसाब मिला रहा हूँ।

मेरे मन में अक्सर
फिक्स डिपॉजिट तोड़कर
मूल प्रेम वापस लेने का
विचार भी आया।

पर उस दृढ अनुबंध की शर्तें
याद आ जाती हैं,
जिसमें अवधि के स्थान पर
सिर्फ एक शब्द लिखा था
"निर्बाध"।

और फिर अगर
मैं अनुबंध तोड़ भी दूँ,
तो कैसे संभाल पाऊँगा
वह समस्त प्रेम

जिसमें मेरे प्रेम का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम का ब्याज
दोनों शामिल हैं।

क्योंकि यह सिर्फ जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त में
हम दोनों का होना जरूरी है।

12 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

वाह!! कितना अनोखा रूपक, सुंदर सृजन

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Aman Peace ने कहा…

Wah!!

M VERMA ने कहा…

Thanks

Digvijay Agrawal ने कहा…

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 21 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Razia Kazmi ने कहा…

प्रेम का बंधन फिक्स डिपाज़िट आपका बहुत अच्छा लगा

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

हरीश कुमार ने कहा…

वाह बेहतरीन रचना

M VERMA ने कहा…

thanks